अब इस्मत आपा के बारे में जो रचनाएं आप पढेंगे वो जल्द ही प्रकाशित होने जा रही है एक किताब ‘इस्मत आपा’ का हिस्सा हैं. इस किताब का संपादन सुकृता पॉल कुमार और अमितेश कर रहे हैं. आज पढ़िए गुबारे-कारवां जो कि उनकी आत्मकथा का एक अंश है.
मैं फूट-फूटकर रो रही थी.
कोई किसी को बड़ी बेदर्दी से मार रहा था. मारने वाला बहुत दानव था और पिटनेवाला मरियल-सा काला-कलूटा बच्चा था. कौन मार रहा था, किसे और क्यों मार रहा था, यह क़तई याद नहीं, क्योंकि मैं उस वक़्त बहुत छोटी थी. मगर मोटा बेंत जब पिटने वाले की हड्डियों पर बजता था तो बड़ी ख़ौफ़नाक चटाखे़दार आवाज़ निकलती थी जो अब तक मेरे कान में सुरक्षित है और अक़सर सुनाई देती है.
शायद जब ही से मुझे मालूम हो गया कि बड़ा छोटे को मारता है, और ताक़तवर कमज़ोर को मारता है. ताक़तवर एक खम्भे की तरह मेरे अवचेतन में खड़ा हो गया, जिसके पैरों तले कमज़ोर कूड़े की तरह फैला हुआ था. तब मेरा सर ताक़तवर के हज़ूर में झुक गया और कमज़ोर से घिन आने लगी.
फिर भी दिल में एक चोर था, जो ख़ुद मुझसे छिपकर बैठ गया. जब कभी मैं किसी आलीशान महल को देखती जिस पर काई जम जाती और घास बेरहमी से छा जाती तो दिल में दुबका चोर चुपके-चुपके मुस्करा उठता और घासफूस की तुच्छ ताक़त का रोब मेरे दिल पर बैठ जाता.
हम इतने सारे बच्चे थे कि हमारी मां को हमारी सूरत से क़ै आती थी. एक के बाद एक हम उनकी कोख़ को रौंदते-कुचलते चले आये थे. उलटियां और दर्द सह-सहकर वह हमें एक सज़ा से ज़्यादा अहमियत नहीं देती थीं. कमउम्री में ही फैलकर चबूतरा हो गयी थीं. पैंतीस बरस की उम्र में वह नानी भी बन गयीं और सज़ा-दर-सज़ा झेलने लगीं. हम बच्चे नौकरों के रहमो-करम पर पलते थे और उनसे हिले-मिले हुए थे.
नौकरों के दो रुख़ होते हैं. एक आक़ा के सामने, दूसरा आक़ा के पीछे. सामने वो हाथ-पैर चूमते हैं, पीठ पीछे गालियां देकर दिल की भड़ास निकालते हैं. घरेलू नौकर से ज़्यादा कोई बदक़िस्मत और मजबूर तबक़ाश नहीं. ख़ास तौर पर हिन्दुस्तान में, जहां बेकारी और गुरबत ने एक बड़ी संख्या को एक सीमित तबक़े के अधीन और गुलाम बना रखा है. हमारे यहां चंद ऐसे नौकर थे जो पुश्त-हा-पुश्त से हमारे ही ख़ानदान की ख़िदमत करते आये थे; जिस्म के साथ उनका जे़ह्न भी गुलाम बन चुका था. ये नौकर निहायत निकम्मे, कमअक़्ल और मक्कार थे. तंग आकर निकाल दिये जाते तो इधर-उधर धक्के खाकर फिर खूंटे पर लौट आते. बिल्कुल पालतू कुत्तों की तरह से. अब तो मुल्क़ तरक़्क़ी कर गया है और कुछ बेकारी कम हो गयी है, इसलिए अब ऐसे माना जे़ह्नियत के नौकर नहीं मिलते. अपने बचपन में मैंने नौकरों की ऐसी दुर्गत देखी कि मुझे आक़ा और नौकर की व्यवस्था से ही नफ़रत हो गयी. मेरी बहुत-सी कहानियों में नौकर पत्र नज़र आते हैं. कमज़ोर, लाचार नौकर, झूठे, मक़्क़ार और चालबाज़ नौकर; मेरी कहानियां नौकरों से भरी पड़ी हैं. मेरी महदूद दुनिया में वर्गभेद नौकर और आक़ा के रिश्ते में नज़र आया. इसने मुझे प्रभावित किया. जब बाक़ी की लम्बी-चौड़ी दुनिया से साबक़ा पड़ा तो पता चला ऊंच-नीच, जात-पांत, सिर्फ़ ढोंग है. असल चीज़ अमीरी और ग़रीबी है; यह एक रवैया है. अमीर ख़्वाह कितना भी अल्लाहवाला हो और क़ौमपरस्त हो, नौकरों से सीखी हुई सीख ही उपयोगी साबित हुई. जब किसी चीज़ की ज़रूरत महसूस की, इधर-उधर हाथ मारकर हासिल की.
रोने और गला फाड़कर चिल्लाने में हम सब बहन-भाइयों को ख़ासी महारत हासिल थी. हमारी अम्मां बौखलाकर हमारा कहना मानने पर मजबूर हो जातीं, हमें अपनी इस ताक़त का तीव्रता से एहसास था. बच्चे रो-पीटकर ही अपनी नापसन्दीदगी का इज़हार कर सकते हैं.एक दिन एक मुहर्रम की शोकसभा में पहली बार मर्सियों और नौहों का मतलब समझ में आया. और जब अली असग़र के हलक़ में तीर पैवस्त होने का ज़िक्र आया तो ख़ौफ़ से मेरी घिग्घी बंध गयी. मैंने बुरी तरह दहाड़ें मारकर रोना शुरू किया, मातम करने वाली बीबियां एकदम चुप हो गयीं और बड़ी हैरत से मुझे देखने लगीं. समझीं, शायद प्रसाद के इन्तज़ार की ज़हमतें नाक़ाबिले-बरदाश्त हो गयी हैं, या कहीं चोट-चपेट आ गयी, या किसी कीड़े-मकोड़े ने डस लिया.
‘‘क्यों मारा? हलक़ में तीर क्यों मारा?’’ मैंने आदतवश मचल-मचलकर पूछा. किसी ने मेरे सवाल का जवाब न दिया. मुझे पागल और ज़िदी समझकर मजलिस से भगा दिया गया. घर वापस आकर फ़ौरन भाइयों ने मेरी शिकायत की कि मैंने मजलिस में हंगामा मचाया, बदतमीज़ी की और सबको शर्मिन्दा करवाया. सख़्त ज़िल्लत से निकाली गयी.मैं शर्म से पानी-पानी हो जाती. ये मेरी ज़िन्दगी की पहली अहम त्रासदी थी और बरसों असर रहा. मजलिसों में जाते मेरा दम निकलता था. फिर हलक़ में तीर मारने का ज़िक्र होगा और कांटेदार गोले मेरे गले में अटकेंगे. मजलिस की पवित्रता भंग होगी.
‘‘तीर क्यों मारा? हाथ में मार दिया होता, बेचारे के हलक़ में क्यों मारा?’’ मैं अपनी बात पर अड़ी रही.
‘‘अच्छा अब बकबक बन्द करो और सो जाओ.’’ डांट पड़ी.
मगर मेरे हिस्से की नींद कहां! जैसे ही आंख बन्द करती, सामने बच्चे के मुंह में चुभा हुआ तीर नज़र आता.
‘‘अबे ग़ारत हो बदनसीब, सो जा चुड़ैल नहीं तो गला घोंट दूंगी.’’ बारी-बारी सब बुजुर्गों ने मुझे क़त्ल करके मुझसे निजात पाने की धमकियां दीं, मगर मेरी सिसकियां न रुकीं. तब डर के मारे मैं शेख़ानी बुआ के पास घुस गयी क्योंकि अकेले पलंग पर मुझे डर लग रहा था.
‘‘क्यों मारा तीर?” मैंने शेख़ानी बुआ की बग़ल में सिसककर पूछा.
‘‘ऊ अजीद हरामी रहे!’’ उन्होंने समझाया.
‘‘तो उसके पास बच्चे को क्यों ले गये?’’
‘‘बच्चा पियासा रहे.’’
‘‘तो उसे दूध दिया होता?’’
‘‘दूध मां का खुसक होई गवा रहे.’’
‘‘तो पानी ही दे दिया होता.’’
‘‘पानी कहां रहे? नहर पे तो ओकी फ़ौज का पहरा रहे.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘अब ई हम का जानें. रहे कुछ गड़बड़.’’
‘‘फिर?’’
‘‘बच्चा का पानी पीयाए ख़ातिर नहर प लै के गये. तो उतार दिहिस तीर.’’
‘‘हलक़ में?’’
‘‘हां.’’
और मेरे हलक़ में बड़े-बड़े कांटेदार गोले फंसने लगे.
‘‘तीर की बच्ची न सोती है, न सोने देती है.’’ मेरी अम्मां ने ऐसे कस-कस के थप्पड़ और घूंसे लगाये कि सचमुच मेरी कर्बला कर दी.
बरसों घर में मेरा इस वाक़िया पर मज़ाक़ उड़ता रहा. जब कोई मेहमान आता तो भाई मुझे ज़लील करने के लिए कहते.
‘‘यह मजलिस में भों-भों रोई थी. निकाली गयी. फिर अम्मां ने उसकी खूब ठुकाई की.’’
अभी चन्द साल हुए, हिटलर के कारनामों के बारे में एक फ़िल्म देखी. लाखों गली-सड़ी लाशों को देखकर मेरे ज़मीर में अली असग़र के हलक़ में अटका हुआ तीर खटकने लगा. वियतनाम में बारह साल से ख़ून की होली खेली जा रही है. सब कहां हैं, कोई रोकता क्यों नहीं! इनसानियत कब तक यूं ही बेबस तमाशा देखती रहेगी. इनसान ने इनसान का बज़ाहिर गोश्त खाना बन्द कर दिया है, लेकिन उसकी ममी बनाकर अब भी हज़म कर रहा है. मुझे ऐसी दुनिया से प्यार नहीं, इसके उसूलों से घिन आती है.
एक और वाक़िया मेरे बचपन का है जिसने मुझे बहुत मुतास्सिर किया. वालिद काफ़ी रौशनख़याल थे. बहुत-से हिन्दू ख़ानदानों से मेलजोल था, यानी एक ख़ास तबक़े के हिन्दू-मुसलमान निहायत सलीक़े से घुले-मिले रहते थे. एक-दूसरे के जज़्बात का ख़याल रखते. हम काफ़ी छोटे थे जब ही एहसास होने लगा था कि हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे से कुछ न कुछ भिन्न ज़रूर हैं. ज़बानी भाईचारे के प्रचार के साथ-साथ एक तरह की एहतियात का एहसास होता था. अगर कोई हिन्दू आये तो गोश्त-वोश्त का नाम न लिया जाए, साथ बैठकर एक मेज़ पर खाते वक़्त भी ख़याल रखा जाए कि उनकी कोई चीज़ न छू जाये. सारा खाना दूसरे नौकर लगाएं, उनका खाना पड़ोस का महाराज लगाये. बर्तन भी वहीं से मंगा दिये जाएं. अजब घुटन सी तारी हो जाती थी. बेहद ऊंची-ऊंची रौशनख़याली की बातें हो रही हैं. एक-दूसरे की मुहब्बत और जान देने के क़िस्से दुहराए जा रहे हैं. अंग्रेज़ों को मुजरिम ठहराया जा रहा है. साथ-साथ सब बुज़ुर्ग कांप रहे हैं कि कहीं बच्चे छूटे बैल हैं, कोई ऐसी हरकत न कर बैठें कि धरम भ्रष्ट हो जाए.
‘‘क्या हिन्दू आ रहे हैं?’’ पाबन्दियां लगते देखकर हम लोग बोर होकर पूछते.
‘‘ख़बरदार! चाचाजी और चाचीजी आ रहे हैं. बदतमीज़ी की तो खाल खींचकर भूसा भर दिया जायेगा.’’
और हम फ़ौरन समझ जाते कि चाचाजान और चचीजान नहीं आ रहे हैं. जब वो आते हैं तो सीख़कबाब और मुर्ग-मुसल्लम पकता है, लौकी का रायता और दही-बड़े नहीं बनते. ये पकने और बनने का फ़र्क़ भी बड़ा दिलचस्प है.हमारे पड़ोस में एक लालाजी रहते थे. उनकी बेटी से मेरी दांत-काटी रोटी थी. एक उम्र तक बच्चों पर छूत की पाबन्दी लाज़मी नहीं समझी जाती. सूशी हमारे यहां खाना भी खा लेती थी. फल, दालमोट, बिस्कुट में इतनी छूत नहीं होती, लेकिन चूंकि हमें मालूम था कि सूशी गोश्त नहीं खाती, इसलिए उसे धोखे से किसी तरह गोश्त खिलाके बड़ा इतमीनान होता था. हालांकि उसे पता नहीं चलता था, मगर हमारा न जाने कौन-सा जज़्बा तसल्ली पा जाता था. वैसे दिन-भर एक-दूसरे के घर में घुसे रहते थे मगर बक़रीद के दिन सूशी ताले में बन्द कर दी जाती थी. बकरे अहाते के पीछे टट्टी खड़ी करके काटे जाते. कई दिन तक गोश्त बंटता रहता. उन दिनों हमारे घर से लालाजी का नाता टूट जाता. उनके यहां भी जब कोई तेहवार होता तो हम पर पहरा बिठा दिया जाता.
लालाजी के यहां बड़ी धूमधाम से जश्न मनाया जा रहा था. जन्माष्टमी थी. एक तरफ़ कड़ाह चढ़ रहे थे और धड़ाधड़ पकवान तले जा रहे थे. बाहर हम फ़क़ीरों की तरह खड़े हसरत से तक रहे थे. मिठाइयों की होश उड़ानेवाली ख्शुशबू अपनी तरफ़ खींच रही थी. सूशी ऐसे मौक़ों पर बड़ी मज़हबी बन जाया करती थी. वैसे तो हम दोनों अनेको बार एक ही अमरूद बारी-बारी दांत से काटकर खा चुके थे, मगर सबसे छिपकर.
‘‘भागो यहां से,’’ आते-जाते लोग हमें दुतकार जाते. हम फिर खिसक आते. फूले पेट की पूरियां तलते देखने का किस बच्चे को शौक़ नहीं होता है.
‘‘अन्दर क्या है?’’ मैंने शोख़ी से पूछा. सामने का कमरा फूल-पत्तों से दुल्हन की तरह सजा हुआ था. अन्दर से घंटियां बजने की आवाज़ें आ रही थीं. जी में खुदबुद हो रही थी.
हाय अल्ला, अन्दर कौन है!
‘‘वहां भगवान विराजे हैं.’’ सूशी ने गुरूर से गरदन अकड़ाई.
‘‘भगवान!’’ मुझे बेइंतिहा हीनभाव सताने लगा. उनके भगवान क्या मजे़ से आते-जाते हैं. एक हमारे अल्ला मियां हैं, न जाने कहां छिपकर बैठे हैं. न जाने कौन-सी रग फड़की कि फ़क़ीरों की सफ़ से खिसक के मैं बरामदे में पहुंच गयी. घर के किसी व्यक्ति की नज़र न पड़ी. मेरे मुंह पर मेरा मज़हब तो लिखा नहीं था. उधर से एक देवीजी आरती की थाली लिए सबके माथे पर चन्दन-चावल चिपकाती आयीं. मेरे माथे पर भी लगाती गुज़र गयीं. मैंने फ़ौरन हथेली से टीका छुटाना चाहा, फिर मेरी बदज़ाती आड़े आ गयी. सुनते थे, जहां टीका लगे उतना गोश्त जहन्नम में जाता है. खै़र मेरे पास गोश्त की बहुतायत थी, इतना सा गोश्त चला गया जहन्नम में तो कौन टोटा आ जाएगा. नौकरों की सोहबत में बड़ी होशियारियां आ जाती हैं. माथे पर सर्टिफ़िकेट लिए, मैं मज़े से उस कमरे में घुस गयी जहां भगवान विराज रहे थे.
बचपन की आंखें कैसे सुहाने ख़्वाबों का जाल बुन लेती हैं. घी और लोबान की खुशबू से कमरा महक रहा था. बीच कमरे में एक चांदी का पलना लटक रहा था. रेशम और गोटे के तकियों और गद्दों पर एक रुपहली बच्चा लेटा झूल रहा था. क्या सुन्दर और बारीक काम था! बाल-बाल खूबसूरती से तराशा गया था. गले में माला, सर पर मोरपंखी का मुकुट.
और सूरत इस ग़ज़ब की भोली! आंखें जैसे लहकते हुए दिये! ज़िद कर रहा है, मुझे गोदी में ले लो. हौले से मैंने बच्चे का नरम-गरम गाल छुआ. मेरा रोआं-रोआं मुस्कुरा दिया. मैंने बे-इख़्तियार उसे उठाकर सीने से लगा लिया.
एकदम जैसे तूफ़ान फट पड़ा और बच्चा चीख़ मारकर मेरी गोद से उछलकर गिर पड़ा. सूशी की नानी मां का मुंह फटा हुआ था. प्रलाप की हालत छाई हुई थी जैसे मैंने रुपहली बच्चे को चूमकर उसके हलक़ में तीर पैवस्त कर दिया हो.
चाचीजी ने झपटकर मेरा हाथ पकड़ा, भगाती हुई लायीं और दरवाजे़ से बाहर मुझे मरी हुई छिपकली की तरह फेंक दिया. फ़ौरन मेरे घर शिकायत पहुंची कि मैं चांदी के भगवान की मूर्ति चुरा रही थी. अम्मां ने सर पीट लिया और फिर मुझे भी पीटा. वह तो कहो, अपने लालाजी से ऐसे भाईचारे वाले मेलमिलाप थे; इससे भी मामूली हादिसों पर आजकल आये-दिन खूनख़राबे होते रहते हैं. मुझे समझाया गया कि मूर्तिपूजा गुनाह है. महमूद ग़ज़नवी मूर्तिभंजक था. मेरी ख़ाक समझ में न आया. मेरे दिल में उस वक़्त पूजा का एहसास भी पैदा न हुआ था. मैं पूजा नहीं कर रही थी, एक बच्चे को प्यार कर रही थी.
इसी सिलसिले में लोगों को मेरा परलोक संवारने का ख़याल आ गया. मेरे दिल में इस्लाम की बरतरी कूट-कूटकर भरी गयी. इस्लाम, जो दुनिया के हर मज़हब से ऊपर और श्रेष्ठ है. यह भाई-भाई का नारा अपनी जगह है, मगर हक़ीक़त यह है कि मुसलमान फिर मुसलमान है. बग़दादी क़ायदा भी शुरू करवाया गया, और अलिफ़ दो ज़बर अन, अलफ़ाज दो जे़रइन, अलिफ़ दो पेश उन, रटते वक़्त बड़ी शिद्दत से नींद आने लगती. अलफ़ाज के तरन्नुम में लोरी का प्रभाव है और जब मुल्लानीजी की क़मची पड़ती तो सारी नींद रफू-चक्कर हो जाती. मुल्लानीजी बहरी और बला की बद-दिमाग़ थीं. सुना है उनके मरहूम शौहर उन्हें चारपाई से बांधकर भीगी हुई रस्सी से उनकी चमड़ी उधेड़ा करते थे. बुढ़िया फ़ी लफ़्ज़ एक-दो थप्पड़ रसीद करती थी. कोई बीस या बाईस बच्चों को पढ़ाती थी और सबको मुस्तक़िल चांटे, थप्पड़, घूंसे मारती थी. सूखी-सूखी उंगलियों से मेरी मोटी-मोटी रानों में ऐसी चुटकियां लेती थी और हाथ नहीं टूटते थे. हम आयतें पढ़-पढ़कर उसके मरने की दुआएं मांगा करते थे. मैंने कभी किसी इनसान से ऐसी तीव्र नफ़रत नहीं की जैसी उस बुढ़िया से की. साथ-साथ उसने जो कुछ पढ़ाया, वह भी मुझे दैवी प्रकोप मालूम हुआ.
बचपन जैसे-तैसे बीता. यह कभी पता न चला कि लोग बचपन के बारे में ऐसे सुहाने राग क्यों अलापते हैं. बचपन नाम है बहुत-सी मजबूरियों का, महरूमियों का. बड़े होकर एक पोज़ीशन बनती है जो नाइंसाफ़ियों का मुक़ाबला करने की ताक़त बख़्शती है. आठ बड़े भाई-बहनों की वात्सल्य झेलने के बाद बड़े होने का बेचैनी से इन्तज़ार था. जब घर में छोटे भांजे, भतीजे पैदा होने लगे तो अपनी बुजुर्गी का एहसास निहायत तसल्लीबख़्श साबित हुआ. समानता का अभाव अमीर-ग़रीब के मामले में ही नहीं, औरत और मर्द के मुक़ाबले में तो और भी ज़्यादा है. मेरे वालिद तो रौशनख़याल थे, उसूलन भी लड़कों से लड़कियों के अधिकारों का ज़्यादा ख़याल रखते थे, मगर वही बात थी जैसे हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई. लड़का-लड़की बराबर. चन्द नारे थे जिनकी लेप-पोत निहायत ज़रूरी समझी जाती थी.यह मेरी ख़ुशनसीबी थी कि होश आया तो बाक़ी की तीन बहनों की शादी हो चुकी थी. कई भाइयों में अकेली लड़की घाटे में नहीं रहती, और फिर ज़रा भी मेरा अधिकारहनन होने का अन्देशा पैदा होता तो फौरन अब्बा के हुज़ूर में मुक़दमा पेश कर दिया जाता. मेरी बहनें निहायत सुघड़ थीं. उर्दू-फ़ारसी, क़ुरान-शरीफ़ के अलावा कशीदाकारी, बुनाई-सिलाई और खाने-पकाने में सिद्धहस्त. मैं निहायत फूहड़. पित्ता मारने की आदत, न दिलचस्पी. भाइयों की नक़ल में पेड़ों पर चढ़ना, साइकिल दौड़ाना, हर जगह मुझे अपनी शिकस्त का एहसास होता. भाइयों के मुक़ाबले में निहायत फिसड्डी. उन्हें भी मुझ पर तरस क्यों आता! मैं अब्बा की शह पर उनकी बराबरी पर तुली हुई थी. बारी-बारी सबको घोड़े की सवारी का मौक़ा मिलता था, जहां मैं घोड़े पे बैठी और भाइयों ने बड़बड़ाया. गुल्ली-डंडा खेलती तो पिदते-पिदते भूसा निकल जाता. फुटबाल खेलने की ज़िद करती तो सारे किक मेरी चांद पर ही पड़ते. भाई मेरी इस ढिठाई से शिकायत से भरे थे. मेरी बड़ी बहनों की शादी से पहले घर पर हुकूमत चलती थी. गोदाम की कुंजी क़ब्ज़े में रहती थी. कपड़े सीती थीं. इसलिए भाई उनके अधीन रहते थे. मैं तो दर्द-सर ही थी.
अज़ीम बेग़ चुग़ताई, प्रसिद्ध उर्दू व्यंग्यकार हमेशा के बीमार ही थे, मैं लड़की होने की वजह से भाइयों के साथ न निभा सकती थी और वह बीमारी की वजह से मजबूर थे. उन्हें कुछ मुझ पर तरस आ गया. उन्होंने मुझे बताया कि लड़के तो बैल हैं, तुम बैल क्यों बनो! पढ़ाई में तुम उनसे टक्कर लो, वहां तुम उन्हें मार लोगी.
फिर उन्होंने मुझे बड़ी मेहनत से पढ़ाना शुरू किया. दो बार मुझे डबल प्रोमोशन दिलवाया और एक बार मुझसे बड़े भाई फ़ेल हुए. वह मुझसे डेढ़ साल बड़े थे, मगर तीन दर्जे आगे थे. फिर एक दिन हम दोनों जब एक क्लास में आ गये और मैंने उनका होमवर्क करके उनकी मदद करनी शुरू की, तब मैं उनसे बड़ी हो गयी. अज़ीम बेग़ चुग़ताई की शह पाकर मैंने क़ुरान का तरजुमा, हदीसें और मुस्लिम हिस्ट्री पढ़ी और अपने अब्बा के बुजुर्ग दोस्तों के बीच में बैठकर अपनी ताज़ा-ताज़ा मालूमात का इज़हार करना शुरू किया. मेरी अम्मां धक से रह गयीं और हस्बे-आदत जूती संभाली, मगर अब्बा की शह पाकर मैंने अपने वालिद के वयप्राप्त दोस्तों की सोहबत में बहुत-कुछ सीखा.
मेरी अम्मां को मेरी हरकतें एक आंख न भाती थीं. मेरे अंजाम की उन्हें सख़्त फ़िक्र थी. ये मर्दमार बातें औरतों को शोभा नहीं देतीं. वह इतनी गहराई से न इन बातों को समझती थीं और न समझा सकती थीं; मगर मुझे मालूम हुआ कि मेरी अम्मां क्यों डरती थीं. यह मर्द की दुनिया है, मर्द ने बनाई और बिगाड़ी है. औरत एक टुकड़ा है उसकी दुनिया का जिसे उसने अपनी मुहब्बत और नफ़रत के इज़हार का ज़रिया बना रखा है. वह उसे मूड के मुताबिक़ पूजता भी है और ठुकराता भी है. औरत को दुनिया में अपना मुक़ाम पैदा करने के लिए निस्वानी सत्रैण साधनों से काम लेना पड़ता है. सब्र, होशियारी, बुद्धिमानी, सलीक़ा जो मर्द को उसका मुहताज बना दे. शुरू ही से लड़के को मुहताज बनाना कि वह अपना बटन टांकते शरमाए. रोटी ठोकते डूब मरे. आसान-आसान छोटे-छोटे काम जो नौकर कर सकते हैं, अपने हाथ से करना, उसकी ज़्यादतियों को सर झुकाकर सहना कि वह शरमिन्दा होकर क़दमों पर गिर पड़े.
मगर मैंने तो भाइयों के हलक़े में ज़िन्दगी गुज़ारी थी. उनका मुक़ाबला किया था और उनसे श्रेष्ठ होने की क़सम खायी थी. ये स्त्रीतत्व मुझे ढोंग लगती थीं. मस्लहत मुझे झूठ मालूम होती थीं, सब्र, बुज़दिली और शकर-मक्कारी. मैंने हाथ घुमाकर कभी नाक नहीं पकड़ी. यहां तक कि बनना, संवरना, सिंगार करना और भड़कीले कपड़े पहनना भी मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं अपनी देह को छिपाकर धोखा दे रही हूं.
‘‘कोई लड़का ऐसी लड़की पर जान नहीं देगा,’’ मेरी होशियार सहेलियों ने समझाया. सहमकर मैंने थोड़ा बहुत समझने की कोशिश की और मेरे भाइयों की बन आयी. तकल्लुफ़ तो रहा नहीं था जो उलटी-सीधी बात न कहते. मैं स्पष्टवादी तो वो चार हाथ साफ़गो. मेरे पीछे घेरी लग गयी. लड़के फांसने को फटकनियां लगा रही हूं. भला फिर मेरी क्या मजाल थी जो सोलह सिंगार कर जाती. और तजरबे से मुझे मालूम हुआ कि सोलह या बत्तीस सिंगार कत्तई ज़रूरी नहीं. मुझे दोस्तों की कभी कमी महसूस न हुई. यही दोस्तियां अक़सर इश्क़ की हदों को छू गयीं. रूस में मैं जब ऐसी लड़कियों से मिली जो कृत्रिमताओं में क़तई दिलचस्पी नहीं लेतीं और निहायत सीधे-सादे कामचलाऊ कपड़े पहनती हैं तो मैंने उनसे पूछा, वो सिंगार क्यों नहीं करतीं.‘‘ज़रूरत महसूस नहीं की. क्यों, क्या मैं बुरी लगती हूं?’’ उसने मुझसे पूछा.
‘‘नहीं, मगर और ज़्यादा अच्छी लगोगी.’’
‘‘मैं खरा माल पेश करने की क़ायल हूं. मेरी अपनी जिल्द, अपने होंठ, मेरी निस्वानियत1 ही काफ़ी है.’’ उसने बड़े विश्वास से जवाब दिया.
यूरोप में भी नौजवान तबक़ा मसनूआत2 से बोर हो चुका है. औरत और मर्द के शाश्वत रिश्ते को क़ायम रखने के लिए मर्द का मर्द और औरत का औरत होना काफ़ी है. मुझे रूसी लड़कियों ने बहुत मुतास्सिर किया. मैंने अपनी कहानियों में औरत की आर्थिक महकूमी और मजबूरी का हमेशा रोना रोया है. एक लड़की अगर अपने वारिसों का सिर्फ़ इसलिए हुक्म मानती है कि इक़्तसादी3 तौर पर मजबूर है तो फ़रमांबरदार नहीं, धोखेबाज़ ज़रूर हो सकती है. एक बीवी शौहर से सिर्फ़ इसलिए चिपकी रहती है कि रोटी-कपड़े का सहारा है तो वह तवायफ़ से कम मजबूर नहीं. ऐसी मजबूर औरत की कोख से मजबूर और महकूम-जे़हनियत इनसान ही जन्म ले सकेंगे. हमेशा दूसरी तरक़्कीयाफ्ता क़ौमों के रहमो-करम पर सन्तोष करेंगे. जब तक हमारे मुल्क की औरत मजबूर, लाचार, जुल्म सहती रहेगी, हम इक्श्त इक़तसादी और सियासी मैदान में एहसासे-कमतरी4 का शिकार बने रहेंगे.
रशीद जहां ने मुझे कमसिनी ही में बहुत मुतास्सिर किया था. मैंने उनसे साफ़ साफ़गोई और खुद्दारी सीखने की कोशिश की.
बचपन में मेरी एक और बड़ी प्यारी सहेली थी. हमारे कोचवान की बेटी मंगू. थोड़ी-सी मुझसे बड़ी थी और बड़ा रोब गांठा करती थी. तेरह-चौदह बरस की थी कि शादी होकर लखनऊ चली गयी. जब अपनी पहली बेटी लेकर आयी तो बड़ी बुझी-बुझी सी हो गयी थी. सारा खिलंदड़ापन ग़ायब, हंसी गुम. लड़की जनने के जुर्म में उसकी सास उसे बहुत मारती थी और उसके मियां से भी पिटवाती थी.
जब वह तीसरी बेटी लेकर आयी तो अब्बा पेंशन लेकर आगरा आ गये थे. आगरे के घुटे वातावरण में मुझे औरत की बेकसी का तजरबा हुआ. पास-पड़ोस की सभी औरतें क्षयरोगी, मुरझाई और शौहरों और सास-ननदों की सताई हुई थीं. ताबीज़, गंडों और जानतोड़ ख़िदमत के बलबूते पर टिकी हुई थीं. मुझे अपने
औरतपने से और भी घिन आ गयी.
मंगू भी क्षयरोग की मरीज़ा मालूम होती थी. सास दूसरी बहू लाने के प्लान बना रही थी जो बेटा जन सके. मंगू के मां-बाप रो-पीट रहे थे. मंगू और उसकी तीन बेटियों के बोझ के ख़याल से कांप रहे थे. मंगू की तीन रोती-बिलखती लड़कियां औरत ज़ात की तुच्छता का खुला इश्तहार थीं. मुझे ख़ुदा की इस नाइनसाफ़ी पर गुस्सा आता था कि उसने मुझे भी लड़की बनाया था. मैं गिड़गिड़ाकर दुआएं मांगा करती थी कि अल्लाह-पाक किसी तरह मुझे लड़का बना दे.
अब्बा ने लखनऊ में पुलिस सुपरिंटेंडेंट के ज़रिये मंगू के मियां पर ज़ोर डलवाया कि वह उसे बुला ले और अगर उस पर सौत लाया तो, हथकड़ियां डलवा दी जाएंगी. साल भर बाद जो मंगू आयी तो पहचान न पड़ती थी. लड़का भी नहीं जना था, फिर भी चिकनी-चुपड़ी हो रही थी. मालूम हुआ, मंगू पर भूतों का साया हो गया था. निहायत ख़तरनाक क़िस्म के मरखने भूत, जो मंगू के जिस्म में समाकर उसे बरग़लाते थे और वह अपनी सास की ठुकाई करती. मियां तक कि पिंडली में एक दिन काट खाया. सब पर उसकी दहशत बैठ गयी. भूत उतारने वाले आये, उन्होंने कहा कि सास मनहूस है. अगर बहू इसके साथ रही तो सात बेटियां जनेगी और सारे कुटुंभ का नाश हो जाएगा. सास बेचारी का पटरा हो गया. मंगू का मियां उसे अपनी नयी नौकरी पर डालीगंज ले गया. वहां वह साहब लोगों के घोड़ों पर लग गया था. तब मुझे मालूम हुआ कि मंगू जाहिल और अनपढ़ थी, बिल्कुल अहमक़ न थी. अपनी बिसात भर जो कुछ कर सकती थी, कर डाला. औरत कमज़ोर हो सकती है, बुद्धिहीन होना ज़रूरी नहीं, लड़कों जैसी अक़्ल और सूझ-बूझ चाहिए. फिर तो मैंने सीना-पिरोना और सुघरापा धरा ताक़ पर और पढ़ने की तरफ़ आकर्षित हो गयी.
मज़हब हमारी जानों पर कभी सिर्फ़ जन्नत की लालच और जहन्नम का खौफ़ बनकर लागू नहीं किया गया. अब्बा के दोस्त हर ख़याल और आस्था के थे. उनकी बातें सुनकर बहुत से वहम और वसवसे दिल से दूर हो गये. हर इनसान अपनी क़ब्र में जाएगा, अपने किये ख़ुद भुगतेगा. दुनिया का भी कोई ख़ास ख़ौफ़ न था. मुग़ल वैसे ही सरफिरे और झक्की होते हैं और हमारा ख़ानदान इतना लम्बा-चौड़ा था कि कहीं सारी दुनिया सिमटी नज़र आती थी. हर शख़्स अपनी चमड़ी में मगन और ख़ुदमुख़्तार.
लड़कों के लिए यह आम रवैया मुनासिब समझा जाता है, मैं लड़की थी. अम्मां, ख़ालाएं, फूफियां, चचियां भयभीत थीं. औरत ज़ात को ये मुंहज़ोरियां शोभा नहीं देतीं. ससुराल में कैसे गुज़र होगी? समाज ने औरत का एक ठिकाना मुक़रर कर दिया है. उससे बाहर क़दम रखा तो पैर छांट दिये जाएंगे. ज़्यादा तालीम भी बलाए-जान होती है. हमारे यहां वचन और कर्म पर पाबन्दी नहीं थी. मगर यह शर्त सिर्फ़ मर्दों तक थी. मुझे इन हरकतों पर डांट खानी पड़ती थी. पता नहीं अज़ीम भाई को क्या मज़ा आता था, वह मुझे और शह देते थे. शाम दफ्तर से आकर अब भी वह मुझसे घंटा दो घंटा इधर-उधर की बातें किया करते थे. बक़ौल क़िस्से, मुझे भड़काया करते थे. उन्होंने संजीदा और खुश्क़ मज़ामीन छोड़कर कहानियां लिखना शुरू कर दी थीं. जो काम यह संजीदा मज़ामीन से न कर पाये, इन कहानियों ने कर दिखाया.
उनकी हीरोइन एक निहायत शरारती और दिलचस्प लड़की की मिसाली सूरत इख़्तियार कर गयी. उनसे मैंने सीखा कि अगर कुछ कहना है तो कहानियों, क़िस्सों में लपेट कर कहो, कम गालियां मिलेंगी. ज़्यादा लोग पढ़ेंगे और मुतास्सिर होंगे. कहानियां लिखने से पहले मैंने कई मज़ामीन लिखे जो छपे भी, मगर किसी ने तवज्जोह न दी. दो-चार कहानियां लिखी थीं कि ले-दे शुरू हो गयी. जैसे टेलीफोन पर आप जो चाहें कह दीजिए, कोई थप्पड़ नहीं मार सकता. वैसे ही कहानियों में कुछ भी लिख मारिये, कोई हाथ आपके गले तक नहीं पहुंचेगा. दूसरे, मुझे शुरू में लोगों की प्रतिक्रिया का पता भी न था. सिर्फ़ साक़ी में लिखती थी. उनके पास जो ख़त मेरे नाम आते थे, वह उन्हें ज़ाया करते थे. बदक़िस्मती से ‘लिहाफ़’ वो पहली कहानी थी जो ऐन शादी के बाद छपी और शाहिद अहमद साहब ने अब मुझे ज़िम्मेदार समझकर सारे ख़ुतूत हिफ़ाज़त से मेरे सुपुर्द कर दिये. इन ख़तों का लहजा इतना भयानक था कि पहले तो मेरे पसीने छूट गये. मैंने सहमकर अपने क़लम की लगाम खींची और अपनी दानिस्त में तो मैंने उसके बाद ढील नहीं छोड़ी, लेकिन बुरा हो उस माहौल का, जहां मैंने परवरिश पायी. धड़ल्ले से बात कहने की आदत नहीं छूटी, और लोग झल्लाकर गालियों पर उतारू हो जाते हैं तो मुझे उनसे कोई व्यक्तिगत शत्रुता नहीं होती. बहुत-सी मारपीट, नोच-खसोट के बाद फिर मिल बैठने की आदत रही. कभी चुटकी लेने में मज़ा आता है, अगर कोई पलटकर पत्थर दे मारे तो उससे नफ़रत नहीं पैदा होता.
ज़िन्दगी में सबसे ज़्यादा मुझे किताबों ने मुतास्सिर किया है. मुझे हर किताब से कुछ न कुछ होता है, अपनी ज़्यादातर उलझनों का जवाब उनमें ही ढूंढ़ा और पाया है. किताबें क़रीबतरीन दोस्त और ग़मगुसार साबित हुई हैं. हज़ारों महरूमियां, अंधेरे इन्हीं दोस्तों के सहारे झेली हैं. हर किताब के लेखक को मैंने एक क़िस्म का रिश्तेदार महसूस किया है. नाम कहां तक गिनाऊं. हार्डी, ब्रांटी सिस्टर्ज़ से शुरू करके बर्नार्ड शा तक पहुंची. मगर रूसी अदीबों ने ज़्यादा मुतास्सिर किया कि जब अक़्ल और होश को किसी रहबर की तलाश थी तब इन किताबों से मुठभेड़ हुई. पोलिटिकल फ़िलासफ़ी ख़ुश्क मज़मून रही और रूसी अदब जे़हन के कोने-कोने में जज़्ब हो गया. चेख़व को तो मैं आज भी बरकत के लिए सीखे हुए के तौर पर पढ़ती हूं. जब कोई कहानी क़ाबू में नहीं आती, पता नहीं चलता कहां से शुरू करूं, कहां ख़त्म करूं, तो मैं दिमाग़ी वरज़िश के लिए चन्द कहानियां चेख़व की पढ़ डालती हूं. एकदम जे़हन पर धार सी रख जाती हैं, और क़लम चल निकलता है.
पढ़ने के बाद बातों का नम्बर आता है. हमारा ख़ानदान निहायत बक्कू है. जब दो-चार मिल बैठते हैं तो बस होश ही नहीं रहता. चलते-फिरते, खाते-पीते बस बके जा रहे हैं. एक साहब मजबूरन गुस्ल करते जा रहे हैं, बहसबाज़ी में हिस्सा लेते जा रहे हैं. थोड़ी-थोड़ी देर बाद खिड़की से सर निकालते हैं, साबुन मलते जाते हैं और बातों का सिलसिला चलाए हुए हैं. मुझे हर इनसान से बात करने में मज़ा आता है.
दुकानदारों से, सौदा-सुलफ़वालों से, टैक्सीवालों से, यहां तक कि भीख मांगने वालों से. बुढ़ियों-बुड्ढों को छेड़कर उनकी मलामतें, गालियां सुनने में भी अजीब लुत्फ़ आता है. तालीमयात्फ़ता आलिम-फ़ाज़िल होने की कोई शर्त नहीं, निहायत जाहिल और सीधे-सादे इनसानों से बात करके कभी-कभी दिमाग़ में खिड़कियां खुल जाती हैं. इनसान को पहचानने के लिए उससे बात करना बहुत ज़रूरी है. बात करने की इतनी प्रेक्टिस हो गयी है कि पांच मिनट में पूरी ज़िन्दगी का ख़ुलासा हाथ आ जाता है. बस चन्द निहायत सीधे, मुख़्तसर से सवाल पूछ लीजिए, मुलाक़ात भरपूर तरीक़े पर हो जायेगी.बातें करना दिलचस्पतरीन मशग़ला है. सफ़िया जांनिसार अख़्तर की पत्नी, मजाज़ की बहन और जावेद अख़्तर की मां से तो उसकी मुख़्तसर सी ज़िन्दगी में इतनी बातें हुई हैं कि औरों से बरसों मिलकर भी न हो पायीं. मण्टो से बातें करके एहसासात पर धार आ जाती थी. छह-छह, सात-सात घंटे मिनटों में गुज़र जाते थे. उसकी बीवी सफ़िया भी एक बातूनी औरत है. सुल्ताना जाफ़री से तो बस गप्पें होती हैं. सरदार जाफ़री से वितंडा और जुम्लाबाज़ी में मज़ा आता है. जिन लोगों ने सरदार से बात की है कि उन्हें अन्दाज़ा होगा कि जितनी कड़वाहट, तीखापन और काट उस शख़्स की ज़बान में है, उतनी ही गर्मी और मिठास भी है. जलाने पर आये तो भूनके रख दे. एक ज़माना था जब महफ़िलों में जिसकी शामत आ जाती, सरदार उसको रुला के ही दम लेते. बस चौमुखी चोटों पर चोटें, जब से बीमार हुए हैं, महफिलें कुछ बुझी-बुझी, मोहतात-सी हो गयी हैं. क़ुदसीया जै़दी से बातें करके जी ही नहीं भरता था. अब उनकी बेटी शमा बातें करती है तो उनकी याद ताज़ा हो जाती है. सलमा सिद्दीक़ी (प्रसिद्ध लेखिका और कृष्ण चन्दर की पत्नी) से बस दो बातें कर लो, मुंह आदि सुगन्धित हो जाएगा. कुर्रतुलएन हैदर इंतिहाई बक्की वाक़ा हुई हैं. निहायत सरपट बोलती हैं जैसे बोलने को बहुत है और वक़्त भागा जा रहा है.
मगर साहब, बातों के मामले में मेरी मामूज़ाद बहनों अख़्तर और जमीला का कोई जवाब नहीं. उनके मुक़ाबले में आमतौर पर लोग गूंगे मालूम होते हैं. उनसे घंटों बातें करने के बाद ऐसा मालूम होता है, मेरी अपनी ज़बान पर से सारा रंग खुरच गया. आप ही आप जुमले होंठों पर से फिसलने लगते हैं. टूटे, अधूरे, कटे-कटे जुमले मगर मानी से भरपूर. उनकी ज़बान में अपनी ननिहाल के नाते दिल्ली की बेगमात की मीठी बोली का अजीब लटका है. मेरी कहानियों में संवाद उन्हीं की ज़बानों से निकलते हुए हैं. पढ़ने, बकवास करने के बाद लिखने की बारी आती है. फ़ारसी हमारे ख़ानदान की मादरी ज़बान समझी जाती थी. हमारे ताया ने फ़ारसी की हिमायत में अकेले तालीम क़तई नहीं दी. फरफर फ़ारसी बोलते, पढ़ते और लिखते थे मगर किसी नौकरी में नहीं खपे.
क़ल्लाश मरे, फिर भी उन्हें ज़िद थी कि सब भतीजों को भी फ़ारसी ही पढ़ाई जाए. हमारे अब्बा जो उनकी हर बात पर हां कर देते थे, इस बात पर अड़ गये. लड़कों को नहीं, हां लड़कियों को फ़ारसी पढ़ाइए, कोई हानि नहीं. यह उस वक़्त की बात है जब बड़ी तीन बहनें फ़ारसी पढ़कर ब्याही जा चुकी थीं. अभ्यास की तख़्ती बनने के लिए ख़ाकसार हाथ आयी. भाइयों ने इस फैसले पर अपनी बरतरी और मुझे फ़ालतू मद कश्रार देकर इतना चिढ़ाया कि फ़ारसी से मेरी चिढ़ हो गयी, मगर ताया अब्बा को सिवाय नमाज़ पढ़ने के और मुझे फ़ारसी पढ़ाने के कोई काम न था. लिहाज़ा वह जीते और मैं हारी. ‘पढ़ो फ़ारसी बेचो तेल!’ भाई जले पर तेल छिड़कते और मैं आंसू बहाती जाती, फ़ारसी रटती जाती. जूं ही मेरा बस चला, मैंने फ़ारसी से बग़ावत कर दी, मगर जब तक ताया अब्बा इतनी पढ़ा चुके थे कि बाद में अपने शौक़ से जब प्राचीन और अर्वाचीन फ़ारसी अदब पर तायराना विहंगम दृष्टि डालने का मौक़ा मिला तो ज़बान सुपरिचित मालूम हुई. उस वक़्त ताया अब्बा का इन्तक़ाल हो चुका था और मैं उनका शुक्रिया भी अदा न कर सकती थी. फिर भी अनजाने तौर पर मुझे फ़ारसी अलफाज़ के इस्तेमाल में तकल्लुफ़ होता था. दूसरे, जो ज़बान घर में बोली जाती थी, इतनी सरपट थी कि कहानियां लिखते वक़्त कभी रुककर सोचने की उलझन नहीं हुई. इनसान अपने हर ख़याल का इज़हार रोज़मर्रा की बोली में कर सकता है. तब मेरी ज़बान हिन्दी से ज़्यादा करीब थी क्योंकि हिन्दी जब इतनी गाढ़ी नहीं हुई थी. निहायत प्रवाहमय और मीठी ज़बान थी जो अब दिल्ली-आगरा की औरतों के लबों पर ज़िन्दा रह गयी है.
लिखने से मैंने हमेशा पढ़ने जैसा लुत्फ़ महसूस किया. मैंने अपनी ज़िन्दगी के निहायत दिलचस्प और निहायत ही कठिन लम्हे लिखने के सहारे झेले हैं. कितने बोझ उतारे हैं और कितने चढ़ाए हैं. यह क़लम मेरी रोज़ी देने वाली भी है और हमदम भी; तनहाई का बोलता-चलता दोस्त भी. उसकी मौजूदगी में मैंने कभी अकेलापन महसूस नहीं किया; मैं जब चाहूं, इस उड़नखटोले के ज़रिए से जिसे चाहूं, बुला लूं. और जब जो आ जाएं तो जो जी चाहे उनसे कहूं, हंसाऊं, रुलाऊं या जी जलाकर खाक़ कर दूं, फिर मूड आ जाए तो पुर्ज़ा-पुर्ज़ा करके नष्ट कर दूं. कठपुतलियों की तरह पुतले बनाकर जैसे चाहूं, नचाऊं. उस वक़्त मुझे एक स्रष्टा की सी शक्ति महसूस होती है. अगर यह बताने लगूं कि मुझे किसने मुतास्सिर नहीं किया तो आसान होगा. ज़िन्दगी में जिससे भी वास्ता पड़ा उसने अपना नक़्श दिमाग़ पर छोड़ा. अज़ीम भाई के बाद मेरे दोस्त, सहेलियां, उस्ताद और राह चलते मिलने वाले. डॉक्टर अशरफ़ ने कितने ही सवालों को सुलझाया. डॉक्टर रामविलास शर्मा ने बिखरे हुए तारों को जोड़कर एक सिलसिला क़ायम करने में सहारा दिया. कृष्ण चन्दर की कहानियों में अजीब-अजीब नाज़ुक पत्थरों से मुलाक़ात हुई.फ़ज़लुर्रहमान, प्रोफ़ेसर-वाइस चांसलर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, से तो जब भी मिलती हूं उन्हें डिक्शनरी की तरह इस्तेमाल करती हूं. किसी भी ड्रामा या शे’र का हवाला दीजिए, फिर वह सुनाते चले जाएंगे. उन्होंने अपने तौर पर मुझे बहुत पढ़ाया है. शाहिद लतीफ़ से शौहर के अलावा एक और रिश्ता था; जब दोस्ती के मूड में आ जाते थे तो बहुत घुटती थी. गो शादी दोस्ती की मौत है मगर हमारी दोस्ती ने बड़ी ढिठाई से साथ दिया. मेरी तमाम नाविलों और कहानियों पर वह पुनर्दृष्टि किया करते थे. कभी उन्हें बताने की हिम्मत नहीं हुई. मगर उनसे छिपाकर मैं उनकी राय को बहुत अहमियत देती थी. पकड़ लेते थे तो बहुत रोब गांठते थे.
बच्चों की नाविल तीन अनाड़ी में मैंने अपने तीन भतीजों को सशरीर उठाकर रख दिया है. अगर उसे जीवनी कहा जाए तो बेजा न होगा.
अलीगढ़ में हमारे खानदानी धोबी नत्थाराम मेरे ख़ासे गहरे दोस्त हैं. जब जाती हूं ख़ुद कपड़े लेने आते हैं, घंटों उकड़ूं बैठे गप्पें मारा करते हैं. मैंने उनकी ज़बान से वो कहानियां सुनी हैं जो किताबों में नहीं मिलतीं. ज़्यादातर अपनी कांपती हुई बूढ़ी आवाज़ में कथाएं गाकर सुनाते हैं. चांदी की अंगूठीवाली उंगली से चौखट पर ताल देते जाते हैं. मिंकारे से म्यूज़िक पीस भी लगाते जाते हैं उनके गुरु एक भिश्ती हैं जो बहुत ज्ञानी हैं. बीच-बीच में गुरु के वचन दुहराते जाते हैं. आल्हा-ऊदल बड़ी धूम से सुनाते हैं. पांच रुपया फ़ीस और एक रुपया आने-जाने का रिक्शे का किराया वसूल करके चार-पांच घंटे सुना जाते हैं. पूछो तो ठेठ ब्रज भाषा में व्याख्या भी कर देते हैं. मैंने उनके वर्ग की ज़बान उन्हीं से सीखी है.
कालेज में मुख़्तलिफ़ धर्मों के बारे में डॉक्टर ठक्कर की क्लास में लेक्चर सुनने के बाद उनकी रहनुमाई में बहुत-कुछ पढ़ने का मौक़ा मिला. मज़हब के बारे में जो कुछ जाले दिमाग में तन गये थे, साफ़ हो गये. बौद्ध मज़हब ने बेहद मुतास्सिर किया. बी.ए. करने के बाद जायदाद के सिलसिले में अपने पैतृक वतन आगरा जाने का इत्तफ़ाक़ हुआ. मालूम हुआ, दूसरे दिन सूशी, मेरी बचपन की गुइयां, की शादी है. सारे घर का बुलावा आया है. मुझे ताज्जुब हुआ कि लालाजी जैसे तंगख़याल, कट्टर इनसान से मेरे भाई का लेनदेन कैसे क़ायम है. मैं ख़ुद तो तमाम बन्धन तोड़कर एक ऐसे मुक़ाम पर पहुंच चुकी थी जहां इनसानियत ही एकमात्रा ख़ुदा रह जाता है, मेरा और सूशी का क्या जोड़! सूशी फ्राड है, जिससे मां-बाप ने पल्ले बांधने का फैसला कर लिया उसी को लौकिक ईश्वर बनाने को तैयार हो गयी. मुझे वह जन्माष्टमी का दिन याद था गो उसके बाद आगरा छूट चुका था और हम लोग अलीगढ़ चले आये थे. लालाजी को पता चला तो झट से छोटे बेटे सुरेश को भेजा. मैंने टालना चाहा.
‘‘शाम को आऊंगी.’’वह देर तक भरी-भरी आंखों से मुझे देखती रही. मेरी झूठी पुरतकल्लुफ़ मुस्कुराहट से उसने धोखा नहीं खाया. उसने शरारत से मुस्कुराहट दबाकर देखा, जैसे रूठे हुए बच्चे को देखते हैं.
‘‘दीदी कहती है, बस दो घड़ी को आ जाओ. फिर रस्में शुरू हो जाएंगी तो बात न हो सकेगी.’’ सुरेश पीछे पड़ गया.
मैं गयी तो सूशी हल्दी लगाये उसी कमरे में बैठी थी जहां एक दिन भगवान कृष्ण का झूला सजाया गया था. जहां से मुझे बेयकबीनी और बेइज़्ज़त करके निकाला गया था. जी चाहा उलटे क़दम वापस चली आऊं, मगर मुझे देखकर वह लपकी.
‘‘कैसी है री चुन्नी,’’ उसने मेरा प्यार का नाम लेकर पुकारा. बचपन के साथ यह नाम भी कहीं दूर छोड़ आयी थी. अजीब सा लगा, जैसे वह मुझसे नहीं किसी और से मुख़ातिब हो रही थी. उसने हाथ पकड़कर मुझे अन्दर घसीटा ओर कुंडी चढ़ा दी. बाहर नानी-मां बड़बड़ा रही थी.
‘‘ऐसे समय हर कोई का आना-जाना ठीक नहीं.’’
‘‘हाय राम, कितनी लम्बी ताड़ की ताड़ हो गयी.’’ फिर भी दीवार में कोई दरार न मिला तो उसने अलमारी खोली और मिठाई की थाली निकाली. मैं लड्डू हाथ में लेने लगी कि बाहर जाकर कूड़े पर फेंक दूंगी. जो हमसे छूत करे, हम उसका छुआ क्यों खाएं!
‘‘ऊंहुक, मुंह खोल.’’
मैंने मजबूरन ज़रा-सा लड्डू कतर लिया. बाक़ी का बचा हुआ लड्डू सूशी ने मुंह में डाल लिया. तो वह भी नहीं भूली थी!
दीवार ने बांहें खोल दीं. देर तक हम सर जोड़े बचपन की सुहावनी हिमाकतों को याद करके हंसते रहे. चलते समय सूशी ने एक नन्हा-सा पीतल का घुटनों चलता भगवान कृष्ण की मूर्ति मेरी हथेली पर रख दी.
‘‘ले चुड़ैल! अब तो तेरे कलेजे में ठंडक पड़ी.’’
मैं मुसलमान हूं, अल्लाह की ज़ात में किसी को शरीक करना जो पाप है. मगर पुराण मेरे वतन की धरोहर है. इसमें सदियों का कल्चर और फ़लसफ़ा समाया हुआ है. ईमान अलैहदा है, वतन की तहज़ीब अलैहदा है. इसमें मेरा बराबर का हिस्सा है जैसे उसकी मिट्टी, धूप और पानी में मेरा हिस्सा है. मैं होली पर रंग खेलूं, दीवाली पर दिये जलाऊं तो क्या मेरा ईमान कंपायमान हो जाएगा? मेरा यक़ीन और चेतना क्या इतना बोदा है, इतना अधूरा है कि टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा? और मैंने तो परस्तिश की हदें पार कर लीं. ग़रज़ कोई कहां तक लिखे! खुली आंखें, खुले कान क्या-क्या देखते सुनते हैं. दिमाग़ में एक नुक्श्ता सा लग जाता है. ये नुक्श्ते जुड़कर अलफ़ाज़ की शक्ल में ढल जाते हैं. अलफ़ाज़ से इबारत की लड़ी बनती है.
कभी ऐसा भी होता है कि नुक़्ते के मोती की जगह ज़ख्म लगता है. ज़ख़्म से ज़ख़्म जुड़कर लफ़्ज़ नहीं बनता, इबारत की लड़ी नहीं संवरती, एक शून्य सा पैदा हो जाता है. जब हिन्दू-मुस्लिम फ़साद की मुल्क के किसी हिस्से से ख़बरें आती हैं तो मेरा क़लम मुझे मुंह चिढ़ाता है. और सूशी का खिलाया हुआ लड्डू हलक़ में ज़हरीला कांटोंवाला गोला बनकर फटने लगता है. तब मैं अलमारी में रखे हुए बालकृष्ण से पूछती हूं.‘‘क्या तुम इस धरती के हलक़ में अटका हुआ तीर नहीं निकाल सकते?’’
‘‘क्या तुम वाक़ई किसी मनचले शायर का ख़्वाब हो? क्या तुमने मेरी जन्मभूमि पर ही जन्म नहीं लिया? बस एक वहम, एक आरजू से ज़्यादा तुम्हारी हक़ीक़त नहीं. किसी मजबूर और बन्धनों में जकड़ी हुई अबला के कल्पना की उड़ान हो कि तुम्हें रचने के बाद उसने ज़िन्दगी का ज़हर हंस-हंसके पी लिया?
मगर पीतल का भगवान मेरी हिमाक़त पर हंस भी नहीं सकता कि वह धातु के ख़ोल में जड़ हो चुका है. सियासत दुनिया का सबसे मुनाफ़ाबख़्श पेशा है, दुनिया का खु़दा है. सियासत के मैदान में खाई हुई मात के स्याह धब्बे मासूमों के खून से धोए जाते हैं. एक-दूसरे की नाआह्ली साबित करने के लिए इनसानों को कुत्तों की तरह लड़ाया जाता है.
क्या एक दिन पीतल का यह खोल तोड़कर ख़ुदा बाहर निकल आयेगा?
कठिन शब्दों के मतलब 1. स्त्रीत्व, 2. कृत्रिमता, 3. आर्थिक, 4. हीन-भावना.
